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हिंदी नहीं तो ............

तन में हिंदी, मन में हिंदी, जन-जन में है हिंदी।। (full 2) तुम में हिंदी, मुझ में हिंदी, हम सब में है हिंदी।। राष्ट्रप्रेम की बात हो या फिर,(2) मन की बात हो चाहे। हिंदी में सब बोलें समझें, हिंदी में ही सोचे और गाए।।(after, 2) हिंदी से प्रेम करो सब,  पराया मत इसको  जानो। हिंदी ही मां है सबकी, महानता इसकी पहचानो।। जब बोलें तब हिंदी बोलें, लिखें-पढें सब हिंदी। (full 2) खूब हुई गुलामी गिटपिट की, बस अब केवल हिंदी। पहचान मिले हिंदी को उसकी, कर लें सब संकल्प। हिंदी है संपूर्ण स्वयं में, नहीं है उसका कोई विकल्प।। (after, 2) कहे श्वेता यह सब जन को, सब करो इसपर विचार। हिंदी को देना है स्थान वही जो, है उसका अधिकार।।(full 2) जय हिंदी जय भारत

Lord krishna

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Black is beautiful.

Lord Ganesha

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अधीन

अधीन सम्पूर्ण विश्व आकस्मिक महामारी कोविड १९ की मार झेल रहा है। लोग आपने घरों में कैद है। लॉकडाउन  १ से हम लोग लोग लॉक डाउन २ की तरफ आ गए है। एक ही शहर में रहते हुए अपनों से मिलना सपनों जैसा हो गया है। विवाह के दो वर्ष पश्चात भी श्रेया रोज़ आपने माता पिता  से फोन पर बात करती है। आज मां से बात करने पर श्रेया को लगा कि जैसे कुछ सही नहीं है। मां ने भी ज्यादा बात किए बिना फोन रख दिया। श्रेया ने आपनी छोटी बहन से मेसेज से बात की तो उसने बताया कि दीदी पापा की तबीयत ठीक नहीं है। उन्हें एक सप्ताह से बहुत ज्यादा खांसी हो रही है। दवाई की थी तो थोड़ा आराम था फिर एक दिन दूसरे डॉक्टर से दवा ली जो उन्हें सूट नहीं की ओर तबसे ज्यादा बेचैनी और खांसी हो गई है। पापा खुद को बहुत ही कमजोर महसूस कर रहे हैं उन्हें ये टेंशन हो गई हैं किं उन्हें कोरोना तो नहीं हो गया है।    श्रेया आपने माता पिता की तीन बेटियों में से सबसे बड़ी बेटी है। माता पिता ने तीनों बेटियों को राजकुमारियों की तरह पाला है। यही बेटियां उनकी जीवन भर की सम्पत्ति है। श्रेया की दूसरी बहन की भी शादी हो चुकी है और वह आपने परिवार...

Nanital lake

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Beauty and peace together in the lap of Nature.

ऐसा तो ना सोचा था!

ऐसा तो ना सोचा था! इस भागती दौड़ती जिंदगी में, एक ही ख्वाहिश हर कोई करता था, एक बार छुट्टी मिल जाय, दफ्तर की टेंशन और कॉम्पटीशन से, एक बार छुट्टी मिल जाय, ना कोई काम हो, ना कोई मेहमान हो,  बस एक घर हो अपना और आराम ही आराम हो। एक दिन सुन के चंदा तारों ने  ये बात रब तक पहुंच दी,  खेल रचा फिर रब ने ऐसा की, सबकी छुट्टी करवा दी। बंद हुए सब ढोल तमाशे,  मंदिर, मस्जिद, गुर्द्वारें, बाज़ार, दुकानें, फैक्टरी, सड़कें, बंद हुए इंसान सारे। एक आवाज़ सबसे आती हैं ऐसा तो ना सोचा था। अब  जब मंथन करते है सब,  आती है एक यही आवाज़ सबके मन से, बहुत कर लिया प्रकृति दोहन,  अब प्रकृति की बरी है,  मनुष्य को मनुष्य से दूर कर,  हकीकत दिखा दी एक ही पल में, फिर भी करता है मनुष्य घमंड खुद पर, उठ चलने की फिर तैयारी है। मौका दिया है प्रकृति ने एक, खुद को खुद से मिलने का, एक ही घर में अजनबी से रहते, लोगों से मिलने जुलने का। कुछ पीछे छुटे लम्हों को, भूल बिसरे सपनों को, फिर से जीने, सच करने का, एक अवसर मिला है कुछ करने का। कुछ करने अपनों के लिए, प्रकृति, वन - उपवन,  जीव ज...