ऐसा तो ना सोचा था!

ऐसा तो ना सोचा था!

इस भागती दौड़ती जिंदगी में,
एक ही ख्वाहिश हर कोई करता था,
एक बार छुट्टी मिल जाय,
दफ्तर की टेंशन और कॉम्पटीशन से,
एक बार छुट्टी मिल जाय,
ना कोई काम हो, ना कोई मेहमान हो, 
बस एक घर हो अपना और आराम ही आराम हो।

एक दिन सुन के चंदा तारों ने
 ये बात रब तक पहुंच दी, 
खेल रचा फिर रब ने ऐसा की,
सबकी छुट्टी करवा दी।

बंद हुए सब ढोल तमाशे, 
मंदिर, मस्जिद, गुर्द्वारें,
बाज़ार, दुकानें, फैक्टरी, सड़कें,
बंद हुए इंसान सारे।
एक आवाज़ सबसे आती हैं ऐसा तो ना सोचा था।

अब  जब मंथन करते है सब, 
आती है एक यही आवाज़ सबके मन से,
बहुत कर लिया प्रकृति दोहन, 
अब प्रकृति की बरी है, 

मनुष्य को मनुष्य से दूर कर, 
हकीकत दिखा दी एक ही पल में,
फिर भी करता है मनुष्य घमंड खुद पर,
उठ चलने की फिर तैयारी है।

मौका दिया है प्रकृति ने एक,
खुद को खुद से मिलने का,
एक ही घर में अजनबी से रहते,
लोगों से मिलने जुलने का।

कुछ पीछे छुटे लम्हों को, भूल बिसरे सपनों को,
फिर से जीने, सच करने का,
एक अवसर मिला है कुछ करने का।

कुछ करने अपनों के लिए, प्रकृति, वन - उपवन, 
जीव जीव के लिए जीने को, सार्थक करने अपने जीवन को, 
एक नई उमंग, उम्मीद भरी सुबह के संग चलने को,
ऐसे मिलेगा यह अवसर ऐसा तो ना सोचा था।
 


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