अधीन

अधीन

सम्पूर्ण विश्व आकस्मिक महामारी कोविड १९ की मार झेल रहा है। लोग आपने घरों में कैद है। लॉकडाउन  १ से हम लोग लोग लॉक डाउन २ की तरफ आ गए है। एक ही शहर में रहते हुए अपनों से मिलना सपनों जैसा हो गया है।

विवाह के दो वर्ष पश्चात भी श्रेया रोज़ आपने माता पिता  से फोन पर बात करती है। आज मां से बात करने पर श्रेया को लगा कि जैसे कुछ सही नहीं है। मां ने भी ज्यादा बात किए बिना फोन रख दिया। श्रेया ने आपनी छोटी बहन से मेसेज से बात की तो उसने बताया कि दीदी पापा की तबीयत ठीक नहीं है। उन्हें एक सप्ताह से बहुत ज्यादा खांसी हो रही है। दवाई की थी तो थोड़ा आराम था फिर एक दिन दूसरे डॉक्टर से दवा ली जो उन्हें सूट नहीं की ओर तबसे ज्यादा बेचैनी और खांसी हो गई है। पापा खुद को बहुत ही कमजोर महसूस कर रहे हैं उन्हें ये टेंशन हो गई हैं किं उन्हें कोरोना तो नहीं हो गया है।   

श्रेया आपने माता पिता की तीन बेटियों में से सबसे बड़ी बेटी है। माता पिता ने तीनों बेटियों को राजकुमारियों की तरह पाला है। यही बेटियां उनकी जीवन भर की सम्पत्ति है। श्रेया की दूसरी बहन की भी शादी हो चुकी है और वह आपने परिवार के साथ इसी शहर में रहती है। श्रेया की यह बहन हॉस्पिटल में काम करती है और इस आपातकालीन समय में उसकी ड्यूटी Covid वार्ड में होने के कारण ना तो वह छुट्टी ले सकती है और ना ही घर जा के आपने माता पिता को मिल सकती है। उसको भी जब पापा की तबीयत के बारे में पता चला तो उसने भी श्रेया को घर जा के उनसे मिल के आने को बोला। 

श्रेया ने यह बात आपने पति शशांक को बताई और माता पिता से मिलने जाने की इच्छा जताई। शशांक ने श्रेया को कहा कि ठीक है  जिस दिन ऑफिस जाओ उस दिन थोड़ा जल्दी निकल जाना और आफिस के ड्राइवर के साथ जा कर मिल आना। या फिर आपने चचेरे भाई को बोलो कि वो आ कर तुम्हें ले जाय और मिलवा लाय। लॉकडाउन के चलते श्रेया घर से ही ऑफिस का काम करती है और सप्ताह में एक दिन ऑफिस जाती है। शशांक से इस समय मिले ऐसे जवाब से श्रेया को बहुत दुख हुआ और आपने आंसुओं कों छुपाते हुए ठीक है वह देखती है कैसे जाना है कह कर चुप हो गई।  

शशांक अपने रिश्तेारों से बहुत अच्छे से बात करता है लेकिन श्रेया के घरवालों से बहुत ही कम या फिर जब कभी श्रेया जबरदस्ती फोन पक्र दे तो । इस पर श्रेया ने उसको बहुत समझाया  भी कि कभी कभी फोन पर बात कर लिया करो लेकिन इसका उस पर कोई असर नहीं होता।  श्रेया के घर में शशांक को बहुत ही मान समान दिया जाता था ।

श्रेया रातभर यही सोचती रही कि उसने शशांक के बारे में जो सोचा वह गलत था? शशांक की क्या श्रेया के माता पिता की तरफ कोई जिम्मेारी नहीं बनती? शादी के बाद शायद इसे ही अधीन होना कहते है। शहर में रहते हुए, घर और ऑफिस का काम करने के बाद भी जब उसके साथ ऐसा हुआ तो फिर उन औरतों को कितना अधीन होना पड़ता होगा जो पढ़ी लिखी नहीं है, या जॉब नहीं करती, खुद से कहीं आती जाती नहीं वह तो आपने परिजनो से मिलने के लिए कितना तड़पती होंगी।  शायद अभी भी ये पढ़ा लिखा समाज, खुद को एडवांस कहने वालो की मानसिकता वहीं पितृसत्तात्मक है। 




  

Comments